जैन लोग रसोई में लहसुन क्यों नहीं खाते, इसका हमारे रोज़मर्रा के जीवन में क्या मतलब है? युवाओं के लिए, इसके पीछे का कारण भी बताइए।

General 147 views Asked 18 August, 2026

Quick Answer

जैन लोग लहसुन और प्याज़ इसलिए नहीं खाते कि ये कंदमूल हैं — अनंतकाय, जिनके एक ही शरीर में अनंत जीव रहते हैं, इसलिए एक ग्रास में असंख्य जीवों की हिंसा हो जाती है। इसी कारण ये 32 अनंतकाय और 22 अभक्ष्य की सूची में हैं और श्रावक के सातवें व्रत (भोगोपभोग परिमाण) में इनका त्याग आता है। 'तामसिक होने से क्रोध-काम बढ़ता है' वाला तर्क वैदिक-आयुर्वेदिक है, जैन ग्रंथों का नहीं।

Detailed Answer

जैन कारण एक ही है : अनंतकाय

जैन वनस्पति-विचार में वनस्पति के दो भेद हैं। प्रत्येक वनस्पति में एक शरीर में एक जीव होता है — जैसे अनाज का दाना या फल। साधारण (अनंतकाय) वनस्पति में एक ही शरीर में अनंत जीव एक साथ रहते हैं। कंदमूल इसी दूसरे वर्ग में आते हैं। इसलिए एक कंद का एक कौर भी अनगिनत जीवों का घात है — यही पूरा तर्क है, और जो उत्तर इस भेद को नहीं बताता वह जैन कारण बताता ही नहीं।

इस वर्ग में आते हैं — लहसुन, प्याज़ (कांदा), आलू, सूरण, गाजर, मूली, चुकंदर, गीली अदरक और गीली हल्दी, तथा शेष सभी कंदमूल।

शास्त्रीय आधार

प्रवचन सारोद्धार (नेमिचंद्रसूरि, 1926) की गाथा में गिनती इस प्रकार दी है — "दस तीसं बत्तीसं बावीसं" : दस विगय, तीस विगइगत, बत्तीस अनंतकाय और बाईस अभक्ष्य। कंदमूल इन्हीं बत्तीस अनंतकायों में गिने जाते हैं, और अभक्ष्य की बाईस वस्तुओं में भी। श्रावक के बारह व्रतों में यह त्याग सातवें व्रत — भोगोपभोग परिमाण — के अंतर्गत नियमबद्ध होता है। अभक्ष्य अनंतकाय विचार (प्राणलाल मंगलजी, 1942) इसी विषय पर लिखी गई पुस्तक है।

'तामसिक' वाला तर्क जैन क्यों नहीं है

सात्त्विक-राजसिक-तामसिक की गुण-व्यवस्था वैदिक, पौराणिक और आयुर्वेदिक चिंतन की है। वहाँ भोजन का वर्गीकरण उसके गुण और मन पर पड़ने वाले प्रभाव से होता है। जैन ग्रंथ इस आधार पर तर्क नहीं करते — वे जीव-गणना से तर्क करते हैं : कितने जीवों का घात होता है, किस प्रकार के जीवों का, और वह किस व्रत को छूता है। दूसरी परंपरा का तर्क बताना हो तो बताया जा सकता है, पर उसे उसी परंपरा का कहकर, जैन कारण के स्थान पर नहीं।

रोज़मर्रा के जीवन में इसका मतलब

रसोई में इसका अर्थ है जयणा — गृहस्थ जीवन का आरंभ अनिवार्य है, पर उसे विवेक से इस प्रकार करना कि हिंसा न्यूनतम रहे। इसलिए जैन रसोई कंदमूल छोड़ देती है, रात्रि-भोजन छोड़ती है, पानी छानकर लेती है और बासी-द्विदल जैसी वस्तुओं में सावधानी रखती है — ये सब एक ही सूत्र के अलग-अलग रूप हैं।

युवाओं के लिए इसे इस तरह समझना सरल है : यह स्वाद पर लगा प्रतिबंध नहीं, गिनती का प्रश्न है। एक सेब में एक जीव, एक कंद में अनंत — जब चुनाव अपने हाथ में हो, तब परंपरा कम गिनती वाला विकल्प चुनने को कहती है। यही निर्णय बाद में बड़े प्रसंगों में भी वही आदत बनकर काम आता है।

हमारी लाइब्रेरी से

  • अभक्ष्य अनंतकाय विचार — प्राणलाल मंगलजी (1942)
  • प्रवचन सारोद्धार उत्तरार्ध — नेमिचंद्रसूरि (1926)
  • आज कल ना अनेक अभक्ष्य पदार्थो नी मार्मिक समज — राजेंद्रसूरि

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