जय जिनेन्द्र कहने का सही तरीका क्या है और इसका हमारे धार्मिक जीवन में क्या महत्व है?
Quick Answer
जय जिनेन्द्र कहने की विधि यह है — दोनों हथेलियाँ छाती के सामने जोड़कर (अंजलि मुद्रा), सिर थोड़ा झुकाकर, सामने वाले की ओर देखते हुए स्पष्ट स्वर में 'जय जिनेन्द्र' कहा जाता है, मिलते समय भी और विदा लेते समय भी; सामने वाला उन्हीं दो शब्दों से उत्तर देता है। साधु-साध्वी को 'जय जिनेन्द्र' नहीं कहा जाता — उनके लिए वंदना के शब्द अलग हैं ('मत्थएण वंदामि', तिक्खुत्तो पाठ, अथवा दिगंबर परंपरा में 'नमोऽस्तु')।
Detailed Answer
कहने की विधि
- दोनों हथेलियाँ छाती के सामने जोड़ें — अंजलि (नमस्कार) मुद्रा। एक हाथ उठाकर या हाथ हिलाकर नहीं।
- सिर थोड़ा झुकाएँ और सामने वाले की ओर देखें।
- 'जय जिनेन्द्र' स्पष्ट स्वर में बोलें — जल्दबाज़ी में निगलकर नहीं।
- मिलते समय और विदा लेते समय, दोनों बार कहा जाता है।
- उत्तर वही दो शब्द हैं — 'जय जिनेन्द्र' का उत्तर 'जय जिनेन्द्र' ही है; हलो, हाथ मिलाना या हाथ हिलाना इसका उत्तर नहीं।
- छोटे पहले कहें; बहुत से लोग कहने के बाद बड़ों के चरणस्पर्श भी करते हैं।
- यह घर में, देरासर में, फ़ोन पर, और पत्र के आरंभ में — सर्वत्र चलता है, और सभी संप्रदायों में : दिगंबर, श्वेतांबर मूर्तिपूजक, स्थानकवासी और तेरापंथ।
अर्थ — यह अभिवादन व्यक्ति का नहीं, जिन का है
'जिनेन्द्र' अर्थात् जिनों के स्वामी — वे तीर्थंकर जिन्होंने राग और द्वेष को जीत लिया। 'जय जिनेन्द्र' का अर्थ है 'जिनेन्द्र की जय हो'। इसकी पूरी विशेषता यही है कि इसमें सामने वाले व्यक्ति की नहीं, जिन की स्तुति है — दो जैन मिलते हैं तो एक-दूसरे का नहीं, जिन का स्मरण करते हैं। इसीलिए इसे बोलते समय ध्यान अपने-आप उस आदर्श की ओर जाता है जिस तक पहुँचना है।
साधु-साध्वी को क्या कहा जाता है
यही वह भाग है जो प्रायः छूट जाता है। श्रमण-श्रमणी को 'जय जिनेन्द्र' नहीं कहा जाता; उनकी वंदना के शब्द निश्चित हैं —
- श्वेतांबर मूर्तिपूजक : 'मत्थएण वंदामि' — खमासमण सूत्र के अंतिम शब्द ("इच्छामि खमासमणो! वंदिउं, जावणिज्जाए निसीहिआए, मत्थएण वंदामि")।
- स्थानकवासी और तेरापंथ : तिक्खुत्तो पाठ — खड़े होकर, हाथ जोड़कर, प्रथम तीन शब्दों के साथ हाथ तीन बार दक्षिणावर्त घुमाते हुए, और अंत में वही 'मत्थएण वंदामि'।
- दिगंबर : मुनि को 'नमोऽस्तु'।
किन बातों का दावा नहीं करना चाहिए
इसकी कोई निश्चित गिनती नहीं है, कोई जप-संख्या या मंत्र-विधि नहीं है, और यह नवकार का विकल्प नहीं है। इसका पाठ किसी आगम में सूत्र-रूप में निर्धारित भी नहीं है — यह परंपरा से चली आ रही समाज-वंदना है, और इससे इसका जैनत्व किंचित् भी कम नहीं होता। जहाँ प्रमाण नहीं, वहाँ प्रमाण गढ़ना नहीं चाहिए : इसकी कोई गढ़ी हुई उत्पत्ति-कथा, आचार्य-नाम या तिथि न मानें।
धार्मिक जीवन में इसका महत्व
दिन में जितनी बार आप किसी से मिलते हैं, उतनी बार यह वाक्य आपके मुख से जिन का नाम निकलवाता है — यही इसका पूरा प्रयोजन है। यह छोटा-सा अभ्यास स्मरण को दिनचर्या में बुन देता है, और समुदाय के भीतर परस्पर आदर तथा एक ही आदर्श की साझी पहचान बनाए रखता है।
हमारी लाइब्रेरी से
- धर्मसंग्रह भाग 02 — खमासमण सूत्र और 'मत्थएण वंदामि' का पाठ
- English Pratikraman — मयूर एवं रीता लोडाया — खमासमण तथा तिक्खुत्तो सूत्रों का पाठ और अर्थ
Source References
This answer is generated by JainGPT and grounded in primary Jain scriptures, commentaries and scholarly texts from our digitised library. See the cited references below and our editorial standards.
Was this answer helpful?
Your feedback helps more seekers find trustworthy Jain wisdom.
🙏 Thank you — your feedback has been recorded.
Read more on this
- Pratikraman: Meaning, the Six Avashyakas and How It Is Performed 'Turning back' - the structured self-review at the centre of Jain practice, performed daily by some and once a year by many.
JainGPT
Comments (Loading...)
Please sign in to add comments and vote.