वन्दितु सूत्र के विषय में कौन-सी आचार्य की शिक्षाएँ या कौन-से जैन आगमों में इसका उल्लेख मिलता है? शास्त्रीय आधार और ग्रंथों का संदर्भ भी दीजिए।
Quick Answer
वंदित्तु सूत्र श्वेतांबर परंपरा का श्रावक-प्रतिक्रमण सूत्र है — प्राकृत की लगभग पचास गाथाएँ, जो आवश्यक (प्रतिक्रमण) परंपरा का अंग हैं। इसे श्राद्ध-प्रतिक्रमण सूत्र तथा प्राकृत में समणोवासग-पडिक्कमण-सुत्त भी कहा जाता है, और नाम इसके प्रथम शब्द 'वंदित्तु' से पड़ा है। इसमें श्रावक सम्यक्त्व और बारह व्रतों के अतिचारों की क्रम से आलोचना करता है।
Detailed Answer
सूत्र क्या है, और किस परंपरा का है
जैन सूत्रों के नाम प्रायः उनके प्रथम शब्द से पड़ते हैं, और यही इस सूत्र के साथ भी हुआ — यह 'वंदित्तु' शब्द से आरंभ होता है, इसलिए वंदित्तु सूत्र। इसके दो और नाम प्रचलित हैं : श्राद्ध-प्रतिक्रमण सूत्र (श्राद्ध अर्थात् श्रावक), और प्राकृत में समणोवासग-पडिक्कमण-सुत्त — 'श्रमणोपासक का प्रतिक्रमण सूत्र'। यह श्वेतांबर परंपरा का सूत्र है और आवश्यक (प्रतिक्रमण) परंपरा का अंग है; दिगंबर प्रतिक्रमण के पाठ इससे भिन्न हैं।
यह विशेष रूप से श्रावक-श्राविका का सूत्र है — साधु-साध्वी के प्रतिक्रमण-सूत्र अलग हैं। यही इसका महत्त्व भी है : बारह व्रतधारी गृहस्थ की आलोचना का यह क्रमबद्ध पाठ है।
इसमें है क्या
लगभग पचास प्राकृत गाथाओं में श्रावक अपने आचरण की समीक्षा करता है, और वह भी क्रम से — पहले सम्यक्त्व के अतिचार, फिर बारह व्रत एक-एक करके : पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत। प्रत्येक के अतिचार गिनाकर उनके लिए क्षमा माँगी जाती है, और अंत में मिच्छामि दुक्कडं। इसीलिए यह केवल पाठ नहीं, अपने ही दिन और अपने ही व्रतों का लेखा है।
इसका पाठ देवसि (सांझ), राइ (प्रातः), पक्खी (पाक्षिक), चौमासी और संवत्सरी प्रतिक्रमण में आता है।
शास्त्रीय आधार और उपलब्ध संस्करण
इस सूत्र का कोई एक मूल रचयिता प्रामाणिक रूप से निर्धारित नहीं है, और जहाँ प्रमाण नहीं वहाँ नाम गढ़ना उचित नहीं। जो प्रामाणिक है वह यह है कि यह आवश्यक-प्रतिक्रमण की परंपरा से चला आया प्राकृत गाथा-सूत्र है, जिसके अनेक संपादित संस्करण और विवेचन उपलब्ध हैं। हमारी लाइब्रेरी में उपलब्ध संस्करण, प्राचीनतम पहले —
- समणोवासग पडिक्कमण सुत्त याने वंदित्तु सूत्र — हीरालाल रसिकदास कापड़िया, जैन सत्यप्रकाश (1938)
- वंदित्तु वालु प्रतिक्रमण अने चत्तारि मंगलम् — संतबाल (1997)
- वंदित्तु प्रतिक्रमण — टी. यू. मेहता (2004)
- श्राद्ध प्रतिक्रमण वंदित्तु सूत्र — हंससागर
- श्राद्धप्रतिक्रमण सूत्रम् वंदित्त्वित्यपराभिधानम् — विजयरत्नशेखरसूरि
- 35 वंदित्तु सूत्र — पूर्वाचार्य
एक शब्द वर्तनी के विषय में
कैटलॉग में यह 'वंदित्तु' (Vandittu, दो 'त' के साथ) लिखा मिलता है, जबकि प्रश्न प्रायः 'वंदितु' या 'वन्दितु' लिखकर पूछा जाता है — इसी अंतर के कारण खोज में ये छहों पुस्तकें छूट जाती थीं। दोनों वर्तनियाँ एक ही सूत्र की हैं।
हमारी लाइब्रेरी से
ऊपर गिनाए गए छह संस्करणों के अतिरिक्त, प्रतिक्रमण की समग्र क्रिया के लिए — श्रावक ना बार व्रत तथा अन्य नियमो (दीपरत्नसागर) और सम्यक्त्व मूल 12 व्रत 124 अतिचार (मलयकीर्तिविजय)।
Source References
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