चातुर्मास का क्या महत्व है

General 2 views Asked 28 July, 2026

Quick Answer

चातुर्मास जैन परंपरा का चार महीने का वर्षावास है — आषाढ़ सुद चौदस (चौमासी चौदस) से कार्तिक पूर्णिमा तक। वर्षा ऋतु में पृथ्वी पर असंख्य जीव उत्पन्न हो जाते हैं, इसलिए साधु-साध्वी विहार रोककर एक ही स्थान पर स्थिर हो जाते हैं — यही अहिंसा का व्यावहारिक रूप है, और यही काल संघ के लिए तप, स्वाध्याय और आराधना का सबसे सघन समय बन जाता है।

Detailed Answer

चातुर्मास (गुजराती-हिंदी में चौमासा, प्राकृत में वासावास) जैन धर्म का चार मास का वर्षावास है। यह आषाढ़ सुद चौदस — चौमासी चौदस से आरंभ होकर लगभग चार चंद्र मास बाद कार्तिक पूर्णिमा पर पूर्ण होता है। सन् 2026 में यह 28 जुलाई से 24 नवंबर तक है।

चातुर्मास क्यों

अहिंसा का व्यावहारिक पालन। वर्षा ऋतु में मार्ग जीवों से भर जाते हैं — कीट-पतंगे, अंकुरित बीज, निगोद, काई और असंख्य सूक्ष्म जीव। ऐसे में विहार करते हुए ईर्या समिति का पालन असंभव हो जाता है और एकेन्द्रिय-द्वीन्द्रिय जीवों की विराधना अनिवार्य हो जाती है। इसीलिए साधु-साध्वी विहार स्थगित कर वर्षावास स्वीकार करते हैं।

आगम का आधार। कल्पसूत्र की समाचारी में वर्षावास के नियम विस्तार से आते हैं, और छेदसूत्रों (बृहत्कल्पसूत्र आदि) में इस काल की मर्यादाएँ निर्दिष्ट हैं।

भगवान महावीर की अपनी चर्या। केवलज्ञान के पश्चात् प्रभु आठ मास विचरण करते और चार मास एक ही नगर में स्थिरवास करते थे — चंपा, वैशाली, राजगृह, मिथिला, श्रावस्ती। चातुर्मास आज भी उसी तीर्थंकर-चर्या का अनुसरण है।

आराधना कैसे होती है

चौमासी प्रतिक्रमण। प्रतिक्रमण के पाँच भेदों में — देवसि, राइ (दैनिक), पक्खी (पाक्षिक), चौमासी (चार-मासिक) और सांवत्सरिक — चौमासी प्रतिक्रमण चौमासी चौदस के दिन किया जाता है।

चार मास के नियम। श्रावक-श्राविकाएँ पूरे चातुर्मास के लिए नियम ग्रहण करते हैं — हरी वनस्पति और कंदमूल का त्याग, चौविहार (सूर्यास्त के पश्चात् आहार-पानी का त्याग), उपवास, आयंबिल, एकासणा, तथा दान, जीवदया और अमारि प्रवर्तन।

पर्व इसी काल में। वर्ष का महापर्व पर्युषण (श्वेतांबर आठ दिन, संवत्सरी पर पूर्ण — 2026 में 8 से 15 सितंबर) तथा दिगंबर परंपरा का दस लक्षण पर्व (2026 में 16 से 25 सितंबर, क्षमावाणी 26 सितंबर) चातुर्मास के मध्य में ही आते हैं। इन दिनों में कल्पसूत्र का सार्वजनिक वाचन होता है।

गुरु का सान्निध्य। साधु एक स्थान पर स्थिर रहते हैं, अतः संघ को चार मास तक प्रतिदिन व्याख्यान, स्वाध्याय और व्यक्तिगत मार्गदर्शन मिलता है। इसी कारण संघ विनती करके गुरु भगवंत का चातुर्मास अपने नगर में कराता है।

समापन। कार्तिक पूर्णिमा पर चातुर्मास पूर्ण होता है, साधु-साध्वी पुनः विहार आरंभ करते हैं और शत्रुंजय आदि तीर्थों की यात्रा पुनः प्रारंभ होती है।

हमारी लाइब्रेरी से

  • चातुर्मास: आत्मउल्लास का पर्व — देवेन्द्रमुनि
  • आषाढ़ चातुर्मासिक व्याख्यानम् — विजयलक्ष्मीसूरि
  • कल्पसूत्र — पुण्यविजय, बेचरदास दोशी

Source References

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