मासिक धर्म में मंदिर न जाने का जैन धर्म में कारण क्या है?

Asked as: “महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान मंदिर में क्यों नहीं जाने दिया जाता है? पाठशाला के बच्चों के लिए सरल भाषा में समझाइए।”

General 160 views Asked 09 August, 2026

Quick Answer

जैन विधि-ग्रंथों में यह नियम स्पष्ट रूप से लिखा है — 'जैन ग्रंथों में इसका उल्लेख नहीं' कहना ठीक नहीं। सूतक चौपाई के अनुसार ऋतुकाल में तीन दिन घर के भांडे आदि से अलग रहना, चार दिन प्रतिक्रमण आदि क्रिया न करना, और पाँचवें दिन के बाद जिनपूजा — तथा अंगपूजा, जिसमें प्रतिमा का स्पर्श होता है, वह नहीं। और वही ग्रंथ यह भी कहता है कि यह स्त्री का दोष नहीं है।

Detailed Answer

पहले दो बातें जो प्रायः ग़लत कही जाती हैं

एक — यह कहना कि इस विषय में जैन ग्रंथ मौन हैं। वे मौन नहीं हैं; विधि-ग्रंथों में दिनों की गिनती तक दी हुई है। दूसरी — यह कहना कि इसका कारण 'स्त्री अशुद्ध हो जाती है' है। परंपरा स्वयं यह कारण नहीं देती, और जिस ग्रंथ में यह नियम मिलता है वही ग्रंथ इस समझ का खंडन भी करता है।

विधि-ग्रंथ क्या कहते हैं

सूतक चौपाई (कल्याणकीर्तिविजय; यही पाठ अनुसंधान अंक 32, संपादक शीलचंद्रसूरि, 2005 में भी संगृहीत है) में गाथावार यह विवरण मिलता है —

  • ऋतुकाल में श्राविका तीन दिन घर के भांडे-बर्तन आदि से अलग रहे;
  • चार दिन प्रतिक्रमण आदि क्रिया न करे;
  • पाँचवें दिन के बाद जिनपूजा करे;
  • अंगपूजा — वह पूजा जिसमें प्रतिमा का स्पर्श होता है — न करे; इसके लिए ग्रंथ चर्चरी ग्रंथ का आधार देता है।

जैन व्रत विधि संग्रह (लब्धिसूरि, 1938) भी श्राविका के पोसह और व्रत-गणना में इन्हीं तीन दिनों को गिनाता है। अर्थात् यह केवल सामाजिक चलन नहीं, अवधि सहित लिखा हुआ विधि-नियम है, और इसका केंद्र पूजा की क्रिया है, स्त्री का व्यक्तित्व नहीं।

और वही ग्रंथ स्त्री के विषय में क्या कहता है

यह भाग सबसे महत्वपूर्ण है और प्रायः छोड़ दिया जाता है। सूतक चौपाई सीधे कहती है कि यदि दर्शन के बीच ही रुधिर आ जाए तो उसे उसका दोष न समझें"तेहनो दोस म जाणो सही" — और विवेकपूर्वक पवित्र होकर वह स्त्री पुनः जिनदर्शन से भवसागर पार करती है। परंपरा का अपना कथन यही है, और बच्चों को समझाते समय यही सबसे पहले बताने योग्य है।

इसे किस ढाँचे में समझें

ये नियम जैन परंपरा के सामान्य सूतक (अशुचि) ढाँचे का अंग हैं — वही ढाँचा जो घर में जन्म होने पर और मृत्यु होने पर भी लागू होता है, और जिसमें पशु-प्रसव तक के दिन गिने गए हैं। अर्थात् यह किसी एक व्यक्ति के विषय में निर्णय नहीं, कुछ परिस्थितियों में क्रिया-विधि का अस्थायी नियम है। इसका विस्तार संप्रदाय और परिवार के अनुसार भिन्न भी रहता है।

बच्चों को सरल भाषा में

देरासर में पूजा की एक विधि है, और उस विधि के अपने नियम हैं — जैसे नहाकर, धुले वस्त्र पहनकर, मुँह ढककर पूजा की जाती है। घर में जन्म या मृत्यु हो जाए तब भी कुछ दिन ये क्रियाएँ रुक जाती हैं। इसी तरह ऋतुकाल में कुछ दिनों के लिए प्रतिमा को स्पर्श करने वाली पूजा नहीं की जाती। इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई गंदा या छोटा हो गया — ग्रंथ स्वयं कहता है कि यह उसका दोष नहीं है। नवकार, स्वाध्याय और भाव से किया गया स्मरण किसी दिन किसी के लिए बंद नहीं होते।

हमारी लाइब्रेरी से

  • सूतक चौपाई — कल्याणकीर्तिविजय
  • अनुसंधान अंक 32 — संपादक शीलचंद्रसूरि (2005)
  • जैन व्रत विधि संग्रह — लब्धिसूरि (1938)

Source References

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