सामायिक क्या है? अर्थ, विधि, समय और ३२ दोष

Asked as: “सामायिक”

Rituals & Worship 114 views Asked 25 August, 2025

Quick Answer

सामायिक जैन धर्म में एक विशेष ध्यान और संयम की अवस्था है, जिसमें व्यक्ति सांसारिक कर्मों से विरत होकर आत्मा की शुद्धि के लिए ध्यान करता है। यह साधना जैन आचार्यों द्वारा नियमित रूप से अनुशंसित है।

Detailed Answer

सामायिक का शाब्दिक अर्थ है समभाव — राग और द्वेष के प्रसंगों में मध्यस्थ रहना, विषम न होना। व्युत्पत्ति यही कहती है: सम + आय = समाय, अर्थात् जिस प्रवृत्ति से समभाव का लाभ हो, वृद्धि हो, वही सामायिक। एक दूसरा पाठ इसे और गहरा करता है — समानां ज्ञानदर्शनचारित्राणां आयः, अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र — तीनों का एक साथ लाभ।

आगम इससे भी सीधा कहता है:

आया सामाइए, आया सामाइयस्स अट्ठेभगवती १/६

आत्मा ही सामायिक है, और आत्मा ही सामायिक का प्रयोजन है। सामायिक बाहर से लाई हुई कोई क्रिया नहीं; यह आत्मा का अपने स्वरूप में लौट आना है।

कसौटी क्या है

समभावो सामइअं, तण-कंचण-सत्तु-मित्त-विसओ त्ति।

तिनके और सोने में, शत्रु और मित्र में जो एक-सा भाव रख सके — वह सामायिक में है। कसौटी यही है; आसन, माला या स्थान नहीं।

करेमि भंते — प्रतिज्ञा में क्या है

सामायिक करेमि भंते सूत्र से आरम्भ होती है। यही सामायिक का प्राण है, शेष सब विधि है।

श्रावक की प्रतिज्ञा:

करेमि भंते! सामाइयं, सावज्जं जोगं पच्चक्खामि, जाव नियमं पज्जुवासामि, दुविहं तिविहेणं — मणेणं वायाए काएणं, न करेमि, न कारवेमि; तस्स भंते! पडिक्कमामि, निंदामि, गरिहामि, अप्पाणं वोसिरामि।

साधु की प्रतिज्ञा:

करेमि भंते! सामाइयं, सव्वं सावज्जं जोगं पच्चक्खामि, जावज्जीवाए तिविहं तिविहेणं — मणेणं वायाए काएणं, न करेमि, न कारवेमि, करंतं पि अन्नं न समणुजाणामि; तस्स भंते! पडिक्कमामि, निंदामि, गरिहामि, अप्पाणं वोसिरामि।

अन्तर सुनने में छोटा है, पर निर्णायक है:

श्रावक की सामायिक साधु की सामायिक
अवधि जाव नियमं — नियत काल तक जावज्जीवाए — जीवनपर्यन्त
कोटि दुविहं तिविहेणं — करना, कराना × मन, वचन, काया = ६ तिविहं तिविहेणं — करना, कराना, अनुमोदना × मन, वचन, काया = ९ (नवकोटि)
नाम इत्वर (अल्पकालीन) यावत्कथिक (जीवनपर्यन्त)

ध्यान देने योग्य बात: श्रावक की प्रतिज्ञा में अनुमोदना का त्याग नहीं है। गृहस्थ जीवन चलाते हुए वह सम्भव नहीं — इसीलिए शास्त्र ने उसे छ: कोटि पर रखा और साधु को नौ पर। यह ढिलाई नहीं, ईमानदार व्यवस्था है।

अवधि — दो घड़ी

सामायिक की परम्परागत अवधि एक मुहूर्त है — अर्थात् दो घड़ी, लगभग ४८ मिनट। (आगम में अन्तर्मुहूर्त को "४८ मिनट से कुछ कम" कहा गया है; उसी से मुहूर्त का माप निश्चित होता है।)

सामायिक के चार प्रकार

सामायिकं चतुर्द्धा — सम्यक्त्वसामायिकं, श्रुतसामायिकं, चारित्रसामायिकं, चारित्राचारित्रसामायिकं चेति।

  1. सम्यक्त्व सामायिक — दर्शन की निर्मलता में समभाव
  2. श्रुत सामायिक — शास्त्र-श्रवण और स्वाध्याय में समभाव
  3. चारित्र सामायिक — सर्वविरति, अर्थात् साधु का चारित्र
  4. चारित्राचारित्र सामायिक — देशविरति, अर्थात् श्रावक की सामायिक

अर्थात् जिसे हम रोज़ "सामायिक करना" कहते हैं, वह चौथा प्रकार है।

बारह व्रतों में स्थान

श्रावक के बारह व्रतों में पाँच अणुव्रत और तीन गुणव्रत के बाद चार शिक्षाव्रत आते हैं — सामायिक, देशावकाशिक, पौषध और अतिथिसंविभाग। सामायिक इनमें पहला है, इसलिए यह श्रावक का नवाँ व्रत कहलाता है। "शिक्षा" शब्द सार्थक है: ये व्रत साधु-जीवन का अभ्यास कराते हैं।

सामाइयम्मि उ कए, समणो इव सावओ हवइ — सामायिक कर लेने पर श्रावक श्रमण जैसा हो जाता है।

सामायिक के ३२ दोष

पारणे के समय जिन दोषों की आलोचना की जाती है, वे बत्तीस हैं — मन के १०, वचन के १०, और काया के १२। इन्हें गिनने का उद्देश्य भय नहीं, सतर्कता है: सामायिक शरीर के स्थिर बैठने से नहीं, मन के स्थिर होने से बनती है।

एक व्यावहारिक बात

सामायिक में सावद्य योग — अर्थात् पाप-सहित प्रवृत्ति — का त्याग होता है। सावद्य योग में कर्तृत्व और फल की आकांक्षा रहती है, जिससे राग-द्वेष उत्पन्न होते हैं और समत्व भंग हो जाता है। इसलिए इन ४८ मिनटों में व्यापार, लेन-देन, सांसारिक निर्णय और उनकी चिन्ता — सब स्थगित हैं। यही "करेमि भंते" में की गई प्रतिज्ञा का सीधा अर्थ है।

(सामायिक की चरण-दर-चरण विधि अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए देखें: Samayik: meaning and full vidhi)

आगे पढ़ें — जैन ई-लाइब्रेरी से

  • सामायिक सूत्र — ज्ञानेन्द्र बाफना (१९७४)
  • आत्मशक्ति का स्रोत : सामायिक — देवेन्द्रमुनि (१९९०)
  • सामायिक : एक आध्यात्मिक प्रयोग — सुभाष लूणकड़ (२००१)
  • आगम ४० आवश्यक सूत्र, हिन्दी अनुवाद — दीपरत्नसागर (२०१९)
  • Equanimity and Meditation: Samayika and Dhyana — सागरमल जैन (१९९९)

Source References

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