वंदितु सूत्र का पाठ करने का सही तरीका क्या है और इसका हमारे धार्मिक जीवन में क्या महत्व है?

General 146 views Asked 11 August, 2026

Quick Answer

वंदित्तु सूत्र कोई स्वतंत्र पाठ नहीं, प्रतिक्रमण की क्रिया के भीतर बोला जाने वाला श्रावक का सूत्र है — देवसि प्रतिक्रमण में सांझ को, राइ में प्रातः, तथा पक्खी, चौमासी और संवत्सरी प्रतिक्रमण में। इसे बोलने का सही तरीका यह है कि प्रत्येक व्रत का अतिचार बोलते समय अपने उसी दिन के आचरण को उसके सामने रखा जाए — यह पाठ नहीं, आलोचना है। पूरी क्रिया-विधि अपने गुरु भगवंत या पाठशाला से सीखनी चाहिए, क्योंकि उसका विस्तार संप्रदाय और गच्छ के अनुसार भिन्न है।

Detailed Answer

पहले यह स्पष्ट कर लें कि यह किसका सूत्र है

वंदित्तु सूत्र श्रावक-श्राविका का प्रतिक्रमण सूत्र है — साधु-साध्वी के प्रतिक्रमण-सूत्र अलग हैं। यह श्वेतांबर परंपरा का आवश्यक-सूत्र है, प्राकृत की लगभग पचास गाथाओं में, और इसे श्राद्ध-प्रतिक्रमण सूत्र भी कहते हैं।

कब बोला जाता है

  • देवसि प्रतिक्रमण — सांझ को, दिन भर के लिए
  • राइ प्रतिक्रमण — प्रातः, रात्रि के लिए
  • पक्खी — प्रत्येक पक्ष के अंत में (चौदस)
  • चौमासी — चार-चार मास पर
  • संवत्सरी — वर्ष में एक बार

यह किसी भी समय पढ़ लेने वाला स्तोत्र नहीं है; इसका स्थान प्रतिक्रमण की क्रिया के भीतर नियत है, और वहीं इसका अर्थ बनता है।

बोलने का सही तरीका

  1. क्रिया के उपकरण और आसन यथाविधि — कटासणा, चरवला और मुँहपत्ति सहित, मुँहपत्ति का पडिलेहण करके। यह क्रिया आरंभ करने से पहले की बात है।
  2. करेमि भंते तथा 'इच्छामि पडिक्कमिउं' के बाद इस सूत्र का स्थान आता है — अर्थात् यह प्रतिक्रमण नामक चौथे आवश्यक के भीतर बोला जाता है।
  3. क्रम मत तोड़िए — सूत्र स्वयं क्रम से चलता है : पहले सम्यक्त्व के अतिचार, फिर पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत, चार शिक्षाव्रत। यही क्रम इसकी उपयोगिता है।
  4. सबसे मुख्य बात — प्रत्येक अतिचार बोलते समय उसके सामने अपना उसी दिन का आचरण रखें। यह सूत्र स्मरण से जल्दी बोल जाने के लिए नहीं, अपने ही लेखे-जोखे के लिए है। बिना अर्थ जाने बोला गया वंदित्तु सूत्र आलोचना नहीं, केवल उच्चारण है।
  5. मिच्छामि दुक्कडं केवल अंत का शब्द नहीं — जिस अतिचार में सचमुच स्खलना हुई है, उसके प्रति भीतर से खेद हो, यही उसका प्राण है।
  6. अर्थ सीखिए — गुजराती-हिंदी अर्थ सहित संस्करण उपलब्ध हैं (नीचे देखें); एक बार अर्थ जान लेने पर वही पाठ बिलकुल भिन्न अनुभव देता है।

क्रिया का शेष विस्तार — कब खड़े होना, कब बैठना, कौन-सा सूत्र किसके पहले — संप्रदाय और गच्छ के अनुसार भिन्न है। उसे अपने गुरु भगवंत, पाठशाला या क्रिया-कराने वाले से सीखिए; यही परंपरा का ढंग है।

धार्मिक जीवन में इसका महत्व

बारह व्रत लेना एक दिन की बात है, उन्हें निभाना प्रतिदिन की। वंदित्तु सूत्र वही प्रतिदिन का उपकरण है — यह व्रतों को स्मृति में लौटाता है, अतिचार को दोष बनने से पहले पकड़ लेता है, और दिन का हिसाब उसी दिन चुका देता है। जो श्रावक इसे अर्थ सहित बोलता है, उसे अपने व्रतों की स्थिति वर्ष में एक बार नहीं, प्रतिदिन मालूम रहती है।

हमारी लाइब्रेरी से

  • समणोवासग पडिक्कमण सुत्त याने वंदित्तु सूत्र — हीरालाल रसिकदास कापड़िया, जैन सत्यप्रकाश (1938)
  • वंदित्तु वालु प्रतिक्रमण अने चत्तारि मंगलम् — संतबाल (1997)
  • वंदित्तु प्रतिक्रमण — टी. यू. मेहता (2004)
  • श्राद्ध प्रतिक्रमण वंदित्तु सूत्र — हंससागर
  • सम्यक्त्व मूल 12 व्रत 124 अतिचार — मलयकीर्तिविजय

Related: प्रतिक्रमण: अर्थ, छह आवश्यक और इसका पालन कैसे करें · वंदितु सूत्र का पाठ क्यों करें: अर्थ और महत्व

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