जैन धर्मग्रंथों में किस सूत्र या आचार्य के अनुसार लहसुन खाने से मना किया गया है और इसका क्या कारण बताया गया है? शास्त्रीय आधार और ग्रंथों का संदर्भ भी दीजिए।

General 2 views Asked 13 October, 2026

Quick Answer

जैन धर्मग्रंथों में लहसुन खाने से मना किया गया है क्योंकि यह अनंतकाय वनस्पति (कंदमूल) है, जिसमें अनंत जीव निवास करते हैं, इसलिए इसका सेवन अनेक जीवों के नाश का कारण होता है। यह विचार 'प्रवचनसारोद्धार' जैसे ग्रंथों में स्पष्ट रूप से मिलता है।

Detailed Answer

जैन धर्म में लहसुन, प्याज, और अन्य कंदमूलों का सेवन वर्जित है क्योंकि ये अनंतकाय वनस्पतियाँ (कंदमूल) मानी जाती हैं, जिनमें एक ही शरीर में अनंत जीव (जैविक आत्माएँ) निवास करते हैं, जिससे इनके एक टुकड़े के सेवन से अनगिनत जीवों का नाश होता है। इस कारण से इन्हें 32 अनंतकायों और 22 अभक्ष्यों की श्रेणी में रखा गया है, जिन्हें श्रावक अपने सातवें व्रत, भोगोपभोग-परिमाण के अंतर्गत त्यागते हैं। इस सिद्धांत का विस्तृत उल्लेख 'प्रवचनसारोद्धार' में मिलता है, जहाँ दस, तीस, बत्तीस और बाईस की संख्या में इन वर्गीकरणों का वर्णन है। जैन दर्शन में यह कारण मुख्य है, न कि वेद या आयुर्वेदिक परंपराओं की तरह तमसिक या राजसिक गुणों का प्रभाव। इस दृष्टिकोण को 'अभक्ष्य अनंतकाय विचार' (प्रणलाल मंगलजी, 1942) और 'प्रवचन सारोद्धार' (नेमिचंद्रसूरी, 1926) जैसे ग्रंथों में विस्तार से समझाया गया है। अतः जैन धर्म में लहसुन खाने से मना करने का शास्त्रीय आधार जीवों के प्रति अहिंसा और अनंत जीवों के विनाश की चिंता है।

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